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१५ वीं शताब्दी में जन्मे सारला दास को उड़िया साहित्य में “आदिकवि” के रूप में जाना जाता है। उनकी रचनाओं में महाभारत सर्वाधिक लोकप्रिय है जो कि सारला महाभारत के नाम से जानी जाती है। उन्होंने इस प्राचीन कथा को न केवल उड़िया आवरण में प्रस्तुत किया अपितु इसकी पुनर्कल्पना भी की। इस कारण सारला महाभारत में उल्लेखित अनेक प्रसंग जैसे कि दुर्योधन का रक्त की नदी को पार करना और शकुनि के चमत्कारी पासों का रहस्य व्यास महाभारत में नहीं मिलते हैं। उसी प्रकार व्यास महाभारत के कई प्रसंग जैसे कि कृष्ण द्वारा अश्वत्थामा को दण्डित करना सारला महाभारत में नहीं मिलते हैं। वहीं कुछ अन्य प्रसंगों की परिकल्पना सारला महाभारत में व्यास महाभारत से काफी अलग है उदाहरणतया द्रौपदी का चीरहरण और पाण्डवों का वनवास।

सारला की कथा में अर्जुन की युद्ध के प्रति अनिच्छा तो देखने को मिलती है पर भगवदगीता का उल्लेख नहीं है। वहीं हस्तिनापुर राज्य का बटवारा नहीं होता है और दुर्योधन की मृत्यु हस्तिनापुर के युवराज की बजाय हस्तिनापुर नरेश के रूप में होती है। यहाँ शकुनि को कृष्ण के परम भक्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो कृष्ण के साथ मिल कर कौरवों के नाश का षड़यंत्र रचते हैं। इन सबके अलावा इन ग्रंथो के बीच कुछ मूलभूत अन्तर भी हैं जैसे सारला महाभारत में कृष्ण की परिकल्पना नारायण के पूर्ण अवतार के रूप में हुई है।

इस ब्लॉग पर सारला महाभारत की कहानियों को हिंदी में प्रस्तुत किया जाएगा जिनका मुख्य स्त्रोत प्रोफेसर बि. ना. पटनायक का सारला महाभारत ब्लॉग है। उनके ब्लॉग की कुछ कहानियों का जर्मन और फ्रेंच में अनुवाद किया जा चुका है।